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Rajat Sharma's Blog | नेपाल में प्रलय: क्या चीन तिब्बत के इको-सिस्टम से छेड़छाड़ कर रहा है?

 Written By: Rajat Sharma
 Published : Aug 28, 2026 04:45 pm IST,  Updated : Aug 28, 2026 04:45 pm IST

सवाल ये है कि अचानक बाढ़ क्यों आई? ग्लेशियर कितनी ऊंचाई पर, कहां पर टूटा? उसके बाद नदी में इतना पानी कैसे आया, क्यों आया? उसकी रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी? क्या इसके पीछे चीन की कोई लापरवाही है? क्या चीन ने वाकई नेपाल को अलर्ट करने में देरी की?

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इंडिया टीवी के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ रजत शर्मा। Image Source : INDIA TV

नेपाल में विनाशकारी सैलाब के बाद अब फिर खतरा मंडरा रहा है। नेपाल सरकार ने भोटेकोशी नदी के आसपास पहने वालों को ऊपर के स्थानों पर जाने को कहा है क्योंकि नदी का जलस्तर बढ़ रहा है और तिब्बत में ग्लेशियर के फिर फट कर गिरने का खतरा है। बुधवार को भोटेकोशी नदी में आई अचाक बाढ़ ने नेपाल के 8 ज़िलों को पूरी तरह तबाह कर दिया है। इस प्राकृतिक प्रकोप में मृतकों की संख्या लगातार बढती जा रही है। करीब डेढ़ हजार लोग लापता हैं, इनमें 290 भारतीय भी हैं। सवाल ये है कि अचानक बाढ़ क्यों आई? ग्लेशियर कितनी ऊंचाई पर, कहां पर टूटा? उसके बाद नदी में इतना पानी कैसे आया, क्यों आया? उसकी रफ्तार इतनी ज्यादा क्यों थी? क्या इसके पीछे चीन की कोई लापरवाही है? क्या चीन ने वाकई नेपाल को अलर्ट करने में देरी की? क्या चीन ने सीमा पर जो बांध बनाए हैं, वो भविष्य में नेपाल और भारत के लिए खतरनाक हो सकते हैं?

नेपाल की नेशनल डिजास्टर मैंनेजमेंट अथॉरिटी ने एक नया अलर्ट जारी किया है। उसने कहा है कि रसुआगढ़ी बॉर्डर से करीब 18 किलोमीटर ऊपर ल्हेंडे नदी का रास्ता अब भी रुका हुआ है। इसकी वजह से एक कृत्रिम झील बन गई है। ये कृत्रिम झील कभी भी टूट सकती है। चीन कह रहा है कि ग्लेशियर भूकंप की वजह से टूटा, लेकिन अमेरिकन जिओलॉजिकल सर्वे ने कहा कि नेपाल में अचानक आई बाढ़ का कारण 4.4 तीव्रता वाला भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर का ढहना था। USGS ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पहले ग्लेशियर टूटा, ग्लेशियर का टुकड़ा 5,200 मीटर की ऊंचाई से 1200 मीटर नीचे गिरा। इसके गिरने से जो कंपन पैदा हुआ, उसे भूकंप कहा जा रहा है। हकीकत ये है कि भूकंप की वजह से ग्लेशियर नहीं टूटा, बल्कि ग्लेशियर टूटकर गिरने से 4.4 की तीव्रता का भूकंप महसूस हुआ।

साफ है चीन ने न सिर्फ ग्लेशियर टूटने की वजह को लेकर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश की, बल्कि नेपाल को इस खतरे की जानकारी देने में भी देरी की। चीन ने रीयल टाइम इंफोर्मेशन शेयर नहीं की, बल्कि नेपाल को 45 मिनट बाद इसकी जानकारी दी। इसकी वजह से नेपाल अपने नागरिकों को अलर्ट नहीं कर पाया। चीन की दूसरी बड़ी गलती ये भी है कि उसने तिब्बत की eco-senstive zone में अवैध निर्माण कर रखा है। चीन ने ऊंचाई वाले ग्लेशियर के इलाकों में 'श्याओकांग मॉडल' पर गांव और बस्तियां बसा दी है। श्याओकांग मॉडल का अर्थ बॉर्डर इलाकों में आधुनिक सुविधाओं से लैस गांव बसाना है। चीन इसे एक सामरिक कदम के तौर पर देखता है। इसके ज़रिए वो सरहदी इलाकों में अपनी भौगोलिक और रणनीतिक पकड़ मज़बूत बनाता है।

ग्लेशियर टूटने की दूसरी वजह ये बताई जा रही है कि चीन ने तिब्बत के केरुंग शहर में पहाड़ियों को बेतरतीब खनन किया है। त्रिशूली नदी के नेचुरल रूट को बदल दिया है। इसके अलावा चीन ने केरुंग में पोर्ट भी बनाया है। आरोप है कि इस बनावट के कारण चीन की तरफ से नेपाल जाने वाले पानी की रफ्तार बहुत तेज़ हो जाती है। नेपाल में कितने लोग मारे गए हैं, कितने लापता हैं, इसका अभी तक सही अंदाज़ा नहीं है। सबसे बड़ी समस्या ये है कि जिन लोगों के अपने लोग लापता हैं, उनके परिवार वालों को कोई सूचना नहीं मिल रही। वो सिर्फ TV पर टकटकी लगाए बैठे हैं, Helpline पर फोन करते हैं। पर जहां ये हादसा हुआ वहां कोई संचार नेटवर्क नहीं है। इसीलिए किसी को कुछ नहीं पता।

किसी को ये भी नहीं मालूम कि ये हादसा कैसे हुआ? परसों से ये कहा जा रहा है कि चीन ने अगर आधे घंटे पहले अलर्ट कर दिया होता तो हजारों लोगों की जान बच सकती थी। चीन कह रहा है कि उसकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई। दूसरी तरफ भारत ने जिस तरह आगे बढ़ कर नेपाल की मदद की, उसकी तारीफ पूरी दुनिया में हो रही है। भारतीय वायु सेना लोगों को बचाने और जरूरी सामान पहुंचाने में पूरी ताकत से लगी है। रेस्क्यू टीम्स घटनास्थल पर मौजूद हैं, helpline active हैं, भारत के दूतावास पूरी दुनिया में अपने लोगों के संपर्क में हैं। असल में ये नरेंद्र मोदी की खासियत है। प्राकृतिक आपदा चाहे नेपाल में हो या टर्की में, भारत की टीम्स, डाक्टर्स  और राहत सामग्री सबसे पहले पहुंचती है। मोदी ने 2002 के गुजरात भूकंप को हैंडल करते समय जो कुछ सीखा, वो अब दुनिया के काम आ रहा है।

आरक्षण व्यवस्था में सुधार के लिए आंदोलन क्यों?

अब बात आरक्षण में सुधारों को लेकर चल रहे मुहिम की। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 अगस्त को जो प्रोटेस्ट हुआ था, उस प्रोटेस्ट से जुड़े लोगों ने केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा से मुलाकात की। इन लोगों में हर्ष दुबे, रणबहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक शामिल थे। लंबी चली इस मीटिंग को दोनों पक्षों ने सकारात्मक बताया। जे. पी. नड्डा ने कहा कि दोनों पक्ष 7 सितम्बर को फिर मिलेंगे। हर्ष दुबे ने बताया कि वो चाहते हैं कि सरकार आरक्षण में जल्द सुधार करे ताकि जिसको आरक्षण की जरूरत है, उसी को आरक्षण मिले।

पहले तो ये impression दिया गया था कि जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट करने वाले आरक्षण को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। ये भी धारणा फैलाई गई कि  ये सवर्ण जातियों के लोग हैं, इनमें ब्राह्मण, ठाकुर हैं, जो आरक्षण को हटाना चाहते हैं। लेकिन उनकी बात सुन कर ये आशंका दूर हो गई। प्रोटेस्ट करने वालों का दावा है कि वो आरक्षण व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। सुधार की गुंजाइश तो हर जगह होती है पर ये सुधार उन लोगों के लिए होना चाहिए जिन्हें वाकई सहायता की जरूरत है। मूल बात ये है कि किसी भी जाति या वर्ग के साथ अन्याय न हो।

2036 ओलंपिक की तैयारी अभी से करो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि भारत के युवाओं को अभी से 2036 ओलंपिक की तैयारी में जुट जाना चाहिए। पांच साल से 15 साल तक उम्र के उन खिलाड़ियों की अभी पहचान कर लेनी चाहिए जो 2036 ओलंपिक में शामिल होंगे। मोदी खेलो इंडिया डायलॉग में बोल रहे थे। इस प्रोग्राम में देशभर से खिलाड़ी और कोच जुड़े। ओलंपिक की मेडल टेली में भारत कई देशों से पीछे हैं। मोदी ने इसकी वजह बताई। उन्होंने कहा कि ओलंपिक में होने वाले आधे से ज्यादा खेलों में भारत के खिलाड़ी हिस्सा नहीं लेते। 2012 ओलंपिक में भारत ने सिर्फ 13 खेलों में हिस्सा लिया, 20 खेलों में भारत के खिलाड़ी शामिल ही नहीं हुए, ये दुख की बात है।

मोदी की ये बात सही है कि भारत का नाम मेडल की tally में इसलिए नीचे रहता है, कि हम गिने चुने खेलों में हिस्सा लेते हैं। हमारे ज्यादातर मेडल कुश्ती, बाक्सिंग जैसे दो चार खेलों से आते हैं। अगर हम बाकी के खेलों के लिए प्लेयर्स तैयार करें तो मेडल जीतने की संभावनाएं बढ़ेंगी। मोदी की ये बात भी सही है कि इसे हासिल करने के लिए एक ecosystem तैयार करना होगा। पर समस्या ये है कि हमारे देश में ज्यादातर खेल फेडरेशन, खासतौर से राज्य स्तर के खेल संगठन ऐसे लोगों के हाथ में है जिनका ध्यान coaching, training और sports infrastructure पर ज़रा भी नहीं होता। उनका फोकस तो अपनी दुकान चलाने में है। उन्हें न players से मतलब है, न games से। वो तो फेडरेशन में अपनी position का फायदा अपने काम कराने और चुनाव में अपने आप को दावेदार बनाने के लिए करते हैं।

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 27 अगस्त, 2026 का पूरा एपिसोड

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